
तुम्हें पढूँ या किताबें समझ नहीं पा रहा हूं मैं।
सपने बनूं या वादे समझ नहीं पा रहा हूं मैं।
अपनी खामोशियों में डूबा हुआ,
तुम्हें ताउम्र सुनना चाहता हूं,
तुम्हारी नटखटी शैतानियों को शब्द देते देते,
उन्हीं का होता जा रहा हूं मैं।
समझ नहीं पा रहा हूं मैं ।
तुम्हारे फोन की पहली घंटी से,
शुभ रात्रि के अंतिम मैसेज तक.,
हर पल तुम्हें सुलझाता हुआ,
खुद ही उलझता जा रहा हूं मै
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