एक रोज़ जो आए तु ख्वाब में,
तो तुझसे मैं तेरा पता पुछूं। ।
ना रकिब पुछूं, ना रंज पुछूं
बस तुझसे तेरा खुदा पुछूं। ।
थामु हाथ तेरा फिर एक दफा़
खुद से ही खुद की खता पुछूं।
लिखूं मैं ख़त तुझे खूं से अपने,
और तुझसे ही तेरी सज़ा पुछूं।
जो टुटे बांध सब्र-ए-इंतेहाई का,
तो तेरी आंखों से मैं हया पुछूं।
