मेरे शब्दों में उस लडकीं व्यथा बताता हूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं, उसकी विवक्ष सुनाता हूँ।   खडी थी नाजुक उमीदें चहरे पर लिए वो, कभी चुटकी-भर, भर लाती आखोँ में आसूँ वो, कभी होठों पर उन्मेष सी हसीं लाती वो, कभी सवालों के प्रश्नचिन्ह भौंहों में बनाती वो, फिर अपनी कसमकश को दातों के बीच, भींंच लेती थी वो,   ना पुछना उसका नाम मेरे दोस्तों, थी नाबालिग के बालिग सपनों की पहचान वो, दोस्तों। थी बिना डोर की बंधी पतंग का आसमान वो, दोस्तों।   इस सभ्य समाज की असभ्यता में फसीं हुईं थी वो, शुभ विवाह के अशुभ बन्धन में बंधी हुईं थी वो, पूजनीय माँ-बाप की कभी बोझ रही थी वो, घर के सरपंचों की ठोकरों की ठोकं रही थी वो, नजाने अपने वक्ष पर कौनसा कर्ज लिए जी रही थी वो,   ना पुछना उसका नाम मेरे दोस्तों, थी नाबालिग के बालिग सपनों की पहचान वो, दोस्तों थी बिना डोर की बंधी पतंग का आसमान वो, दोस्तों   चहाती थी अपनी चाहतों को पंख लगाना वो, चहाती थी दूसरों को देख जगी भावनाओं को जगाना वो, चहाती थी स्वयं को राधा बना कृष्ण का प्यार पाना वो, चहाती थी बस ईश्वर को अपने मन की बात सुनाना वो कि ना चहाती थी कटुक घोसलें की कभी पंख-रहित चिडिय़ा बनना वो।   ना कभी पुछना उसका नाम मेरे दोस्तों, थी नाबालिग के बालिग सपनों की पहचान वो, दोस्तों थी बिना डोर की बंधी पतंग का आसमान वो, दोस्तों।