कही लाल हूँ सिन्दूर में,
मैं लाली मेरे सुहाग की।
कही बंधी हूँ मगंलसूत्र में,
मैं मगंल मेरे सुहाग की।
कही बिंदी हूँ मस्तक में,
मैं निशानी मेरे सुहाग की।
कही साथ हूँ सात-फेरों में,
मैं रानी मेरे सुहाग की।
कही कुछ हूँ सब में,
मैं सबकुछ मेरे सुहाग की।
कही बात हूँ बातों में,
मैं बातें मेरे सुहाग की।
कही काजल हूँ आँखों में,
मैं दृष्टि मेरे सुहाग की।
कही श्रंगार हूँ दर्पण में,
मैं चेहरा मेरे सुहाग की।
कही बूंदें हूँ माथे में,
मैं महनत मेरे सुहाग की।
कही मोती हूँ आँखों में,
मैं आँसू मेरे सुहाग की।
कही सपना हूँ नीदों में,
मैं यादें मेरे सुहाग की।
कही बंसी हूँ भजनों में,
मैं पूजा मेरे सुहाग की।
कही त्याग हूँ परित्यागों में,
मैं त्यागी मेरे सुहाग की।
कही माँ हूँ बच्चों में,
मैं पत्नी मेरे सुहाग की।
कही बाती हूँ तेल में,
मैं चिराग मेरे सुहाग की।
कही पत्र हूँ विनती में,
मैं खुशियाँ मेरे सुहाग की।
कही दोषी हूँ किस्मत में,
मैं दूरी मेरे सुहाग की।
कही जिन्दी हूँ मरने में,
मैं सांसें मेरे सुहाग की
कही अधूरी हूँ पूरे में,
मैं जीवन मेरे सुहाग की।
कही बैठी हूँ स्वर्ग में,
मैं लंबी उम्र मेरे सुहाग की।