मैं चहाता हूँ
गलतियों ने दूर किया गलती से मिले।
बने हुए, मिटाने है कुछ शिकवे-गिले।
बैठ जाए जरा करीब होकर, क्या पता
फिर मिले, ना-मिले, किससे-कहाँ मिले।
मैं चहाता हूँ
मेरी सासें तेरी सासों से इस कदर गले लगे।
कि मेरे सवालों के जवाब तेरे होठों से मिले।
कुछ दुश्मनी हवाओं से भी लेनी है हमें, तू आ
इतने करीब कि हवाओं को भी रास्ता ना मिले।
मैं चहाता हूँ
मेरे केश तेरे गेसुओं से इस कदर उलझे।
कि इन्हें सुलझाने में मेरी उम्र गुजर चले।
बस सुलझाती रहे यह उलझनें जब
मेरी करीबी इस कदर तेरी करीबी से मिले।
मैं चहाता हूँ
तेरे पैर जमी पर ना पडे जब तू मुझसे मिलने चले।
तेरे पैरों को मेरे पैरों पर रख यह सीढीयां तेरे लिए बने।
कुछ समय का यह सफर कुछ समय तक चलेगा यूँही
बस ठहर जाए वो मंजर जब तू मुझसे मुझ-तलक मिले।
मैं चहाता हूँ
तू शीत की शीतलता सा शीतल मुझे कर चले।
मेरे अंगारों की अग्नियों पर तेरी हिम बरस चले।
ओढ ली है चादर अग्नियों को छुपाने के लिए
उतार दू यह चादर जब तू शीत सी मुझको मिले।
मैं चहाता हूँ
बैठा रहूँ इस सूखे पेड़ की सूखी छाया तले।
हरियाली के बीज को अपने अन्दर रखे हुए।
तेरी धरा पर तेरी इजाजत से बीज को सीच दू
गर तू, मेरी पहेली की पहली रात को मेरी होने को मिले।
मैं चहाता हूँ
जरूरी नहीं कि जरूरी हो यह सब मिले।
तेरा मिलना है जरूरी मेरे मिलन को यह पता चले।
बस बैठ जाए तू जरा मेरे करीब होकर, क्योंकि
क्या पता फिर मिले, ना-मिले, किससे-कहाँ मिले।