कभी कभी मन में चढ़ाते-उठते गुबारों को समझ पाना बहुत मुश्किल होता है, और समझा पाना तो और भी मुश्किल होता है। इतना सब कुछ जानने के बाद भी मैंने एक बार फिर उनको सब कुछ समझने का प्रयास किया और काफी बहस, वाद -विवाद के बाद भी जब मै असफल रहा तो ये समझ में आया की ये सब हवा में चित्र बनाने बनाने जैसा है।
हमारी बात-चीत को बीच में ही छोड़कर वो कमरे से बहार निकल गयी, और दरवाजे की आवाज से पूरे कमरे की शान्ति एक बार फिर उसी के साथ चली गयीं।
उस क्षण के बाद हर एक पल मै खुद को अपराधी मानने लगा था। उसके कथनानुसार , कहीं न कहीं मेरा घमंड हमारी बातचीत के आड़े आ जाता और हम एक दूसरे से किनारा करने की कोशिस में लग जाते थे।
लेकिन कब तक ऐसा, रोज़ मेरे मन में ये ख्याल कुरेदता की मै एक और बेहतरीन प्रयास करू उसे अपनी बात समझने का जैसे की एक अध्यापक करता है अपने किसी चहेते छात्र के लिये।
अच्छा है, कई बार कुछ रिश्तों में कड़वाहट सिर्फ, ठीक से बात की न समझा पाने से ही आ जाती है। इसीलिए हमें बात करने से बिलकुल नहीं घबराना चाहिए। सही शब्दो के साथ समन्वय और प्यार से कोशिश करने से बात बन ही जाती है।
मैंने वैसे ही करने का एक प्रयास किया -
मै सुबह की सैर के बाद घर में जैसे ही दाखिल हुआ तो मैंने देखा की वो तुलसी के कुछ पत्तों को चाय में डालने के लिए तोड़ने जा रही थी मैं रुका और बोला की -
'आजकल चाय ठीक से नहीं बनती है, लगता है की वो तुमसे डर गयी है और इसिलए उसका स्वाद उसका कड़कपन उसकी रंगत के साथ आने से घबराने लगा है'
इतना कहते हुए अभी मैंने उसके हाथ थामे ही थे और मेरी आंखे उसकी आँखों को देख रही थी और मन ये अनुमान लगा रही थी की वो अपनी कलाई ढीली करे तो मै वो पत्तियाँ ले लू, और कोशिस करते हुए मैंने कुछ और कहा वो ये की
"लायो आज चाय मै बनता हु और तुमको" .....
पर उसके चहरे की वो सख्ती और लालपन देखने के बाद मेरे अगले सब्द मेरी जुबान से नहीं निकल सके और वो अंदर ही हलक में कहीं दफ़न हो गये। और उसकी मुट्ठी कसती गयी और मेरी खुलती गयी, और उसने कुछ बोले बगैर ही मेरे सरे शब्दों के उत्तर दे दिए और हाँ कड़क उत्तर थे वो। मुझे लगा की अब वो कुछ नहीं बोलेगी और न मै कुछ कह पायूँगा और उसके आगे जाने के साथ मेरी विफलता मुझे चट्टानी रूप लेती दिखी।
पर एकाएक वो रुकी और बोली-
' क्या! चाय का स्वाद सिर्फ मेरे डर से ही उसकी रंगत पर नहीं आ रहा है ,अरे सरकार कभी अपनी जुबान भी चख के देखो की, मुददतो की मिर्च लगी है इस पर, कहीं वो ही तो चाय के स्वाद को आपकी जुबान तक न पहुंचने देती हो' और और बोलते-बोलते रुकी और फिर किचन की ओर बढ़ाते हुए उसके कदम, उड़ता हुआ उसका पल्लू, लहराते हुए उसके बाल,
और मेरी आंखे का धुँधलापन कुछ और न देख सका और न ही मेरी जुबान से एक भी शब्द निकल पाया , और वो ओझल हो गयी दीवार के पीछे।
और मैं भी अपने कमरे की तरफ बढ़ा, मन में लाखो सवाल लिए की-
सच में ये इतना मुश्किल है की क्या मै अब कभी समझायुंगा उसे, क्या अब सब ऐसे ही रहेगा, और इस तरह हर खोखला प्रयास हम दोनो को और दूर कर रहा था ,मन में विस्वास था की हम कभी अलग नहीं हो सकते हैं और मै सब संभाल लूंगा। पर सायद मै गहराई नहीं माप पा रहा था उस तत्कालीक दर्रे की जो हमारे बीच पनप रहा था।
by Tiwari vikas 'Kaiv