अब न वो बात है

न जज़्बा है

कोई कहानी नही है

मैं ठूंठ सा खड़ाहूँ

इस बात से बेखबर

की इस वीरान

बगीचे में

अब कोई बसंत

आनी नही है

फिर भी मय्यसर हो कोई

कोपले मेरे सखो पर ऐ खुदा

मेरी किसमत में

इतवार के सिवा और

कोई निशानी नही है।

kaiviak