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‘दर्पण


उनकी झुकती-उठती,पलकों का वो एहसान ।उनकी नज़रे,और न जाने कितने मचलते अरमान ।किस्से जो न सुनाये,मैंने कभी किसी से।वो सब, मेरे साथी,‘दर्पण’! तुम्हे मालूम है।©kaiviak

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