आँखों में बसे,यादों में फँसे,चाभी भी थी ,चाहत भी थी,उन धागों से मगर,न रिहा हो सके!विकास तिवारी
आँखों में बसे,यादों में फँसे,चाभी भी थी ,चाहत भी थी,उन धागों से मगर,न रिहा हो सके!
विकास तिवारी