है अमावस की ये रात काली, मगर

ऐसे अन्धेरों से अब न घबराएंगे।

ढ़ूंढ़ लेंगे दिया, तेल, बाती, अगन,

फिर से साहस,यकीं,रोशनी पाएंगे।।

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कोई दिखता नहीं, किसको आवाज दें,

जिसकी मौजूदगी ही सहारा बने।

कुछ तो अहसास हो,मन में, मस्तिष्क में,

चेतना सा जो रग रग में दौड़े, धुने।।

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सब्र हो सारथी, बुद्धि आयुध सदृश,

रास्ते खुद-ब-खुद ही नजर आएंगे।

ढ़ूंढ़ लेंगे दिया, तेल, बाती, अगन,

फिर से साहस, यकीं, रोशनी पाएंगे।।

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आज की नींव मजबूत होगी अगर,

तो इमारत भी कल की, बनेगी सुदृढ़।

बेअसर होंगे तूफान, आंधी, कहर,

ऐसा होगा अभेद्य, इरादों का गढ़।।

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ना झुकेगा कहीं, ना ही टूटेगा अब,

हौसले को कवच ऐसा पहनाएंगे।

ढ़ूंढ़ लेंगे दिया, तेल, बाती, अगन,

फिर से साहस, यकीं, रोशनी पाएंगे।।