गांव को, गांव में छोड़...आए शहर ,
और आकर, चकाचौंध में खो गए।
लेके आईं यहां हमको मजबूरियां,
पर सदा को यहीं के ही हम हो गए।।
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छोड़कर. .खेत, मैदान, चौपाल, घर,
एक कमरे में जीवन गुजारा यहां।
दूर होकर स्वजन,साथियों से स्वत:,
बेरहम कारकों ने संवारा यहां।।
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लौट पाए न फिर वो सदा के लिए,
नौकरी के लिए जो शहर को गए।
लेके आईं यहां हमको मजबूरियां,
पर सदा को यहीं के ही हम हो गए।।
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खाना, पानी, हवा स्वास्थ्य वर्धक सभी,
खेत,खलिहान, बागों की हरियालियां।
उगते सूरज की लाली से निखरा क्षितिज,
झिलमिलाते सितारों की वो थालियां।।
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पर यहां तो प्रदूषण, मिलावट के संग,
यूं असंख्यों के जमघट में हम खो गए।
लेके आईं यहां हमको मजबूरियां,
पर सदा को, यहीं के ही हम हो गए।।


