करके कवायद कारवां, मंजिल को बढ़ गया,
हम रास्ते में फूल बिछाते ही रह गए।
जो हमसफर थे, साथ साथ हम कदम चले,
हम रहबरों से हाथ मिलाते ही रह गए।।
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सबकी नजर में है अलग, जीवन का फ़लसफ़ा,
सबकी अलग मिसाल, अलग ही उसूल हैं।
माफिक है जिसे, जिस तरह के हाल में जीना,
उसको उसी के हाल में जीना कबूल है।।
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राहों के शूल सबक, फूल बन गए राहत,
आबोहवा का आस पास में सुरूर है।
मंजिल अगर हो सामने, रूकते नहीं कदम,
अब भी न छोड़े हाथ तो उसका कसूर है।।
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ये कारवां है जिन्दगी का कारवां, डगर,
छोटा है कहीं, और कहीं दूर का सफर।
कोई कहां मिले, कहां छूटे नहीं मालूम,
आने की है आहट, नहीं जाने की है खबर।।
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अपनी ही बात को सभी, हैं मानते अहम्,
फिर भी सलाह लेना, कोई छोड़ता नहीं।
नित खोजते हों आचरण में भले ऐब, खामियां,
अन्तिम सफर में दिल को कोई तोड़ता नहीं।।


