जो न हो उपलब्ध, उसकी लालसा होती है हर क्षण,

जो न हो किस्मत में, उसके ख्याल आते हैं जहन में।

हो न जिसकी कामना,वो मिल भी जाए तो सहज है,

और जिसकी कामना हो, ना मिले, पीड़ा गहन में।।

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मन की वाचलता का न अनुमान, न पैमाना है कोई,

समय के संदर्भ में, नित स्वप्न नया रूप  लेते।

मन के आंचल मे विचरती, कामनाओं के सुफल हित,

हम कई अंतर्विरोधों, को बड़े बेमन से खेते।।

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दृढ़ हो मन, मस्तिष्क सक्षम, तो लगामें खींचता है,

राह अनुचित को न मिलती,बस उचित ही साथ चलते।

डोरियों  में  उन  लगामों  की, इरादे  झूलते  हैं,

हो अवांछित याकि मनवांछित, सभी हमको हैं छलते।।