एक पल का सुख, नहीं सुख की किसी श्रेणी में आता।
एक पल का दुःख, न मानव मन कदाचित झेल पाता।।
फिर भी हम सुख-दुख के,पलड़ों में सदा ही झूलते हैं।
दुःख मे निराशा से ग्रसित होते हैं, सुख में फूलते हैं।।
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बिना सुख के दुःख का हर अहसास कमतर ही कहाता।
दुःख बिना गर सुख ही सुख हो,तो न सुख का मोल पाता।।
सुख न हो तो जिन्दगी की, हर खुशी बेनाम होंगीं।
और दुख के बिन, निरर्थक जिन्दगी नाकाम होगी।।
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दुःख को दुख है, उसकी दुनियां में कहीं चाहत नहीं है।
सुख अधूरा क्योंकि, उसकी आत्मा आहत नहीं है।।
पूर्ण सुख या पूर्ण दुःख से जिन्दगी का क्रम न चलता।
दर्द और खुशियों से मिलकर ही सदा जीवन संभलता।।
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सुख में हंसना, दुःख में रोना, ही नियति इंसान की है।
इनको मिलकर झेलने, खिलने में गति इंसान की है।।
इनकी अति करके, न अपनी जिन्दगी दुश्वार करना।
है जरूरी सदा सबसे, समोचित व्यवहार करना।।


