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तेजपाल सिंह ‘तेज’ ;; बढ़ती ही जा रही है दलित उत्पीड़न की हिंसक घटानाएं : बहुजनों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व खामोश

बढ़ती ही जा रही है दलित उत्पीड़न की हिंसक घटानाएं : बहुजनों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व खामोश


-तेजपाल सिंह ‘तेज’


 

           यह सर्व विदित है कि दलितों पर अत्याचार सदियों होता आ रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। आज भी यहाँ-वहाँ दिलितों पर अत्याचार की घटनाएं घटती ही रहतीं हैं।न्यूज़ लॉन्चर के हवाले से यह जाना कि हाल ही में मनियारी थाना क्षेत्र के एक गांव में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। बाराती का रास्ता बनाने पर दबंगों ने दलित परिवार के साथ मारपीट की है। दबंगों द्वारा महादलित दंपति को निर्वस्त्र कर पीटा गया और फिर महिला के पति के मुंह में पेशाब किया गया। पूरा मामला कुछ इस प्रकार बताया जा रहा है कि महादलित टोले में पड़ोसी की बेटी की शादी में बारात आनी थी। बारातीयों को आने में कोई कठिनाई न हो, इसके लिए पगडंडी में कीचड़ से भरे गड्ढे को सभी टोला निवासियों ने मिट्टी डालकर चलने लायक बनाया था। ये बात दबंगों को नागवार गुजरी। इसपार आक्रोशित दबंगों ने मौके पर पहुंचकर दलितों को जातिसूचक गालियां दीं गईं और उनके साथ मारपीट भी की गई। इस दौरान एक दबंगों में किसी के द्वारा कथित तौर पर व देवेंद्र मांझी ले से सिर पर चाकू से हमला कर दिया गया। पिटाई की सूचना पर बचाने आई पीड़ित की पत्नी को भी दबंगों ने नही छोड़ा और अर्धनग्न कर उसके साथ भी मारपीट की गई। इसके बाद दबंगों ने उसके पति को जमीन पर पटककर उसके मुंह में पेशाब कर दिया गया। इसके बाद सभी दबंग पीड़ित को धमकी देकर गए कि उनके घर में आग लगाकर उन्हें मार देंगे। पीड़ित दंपति ने मनियारी थाना में गांव के ही दबंग पिता-पुत्र को नामजद करते हुए तीन अज्ञात हमलावरों पर एफआईआर दर्ज कराई गई।

           पीड़ित द्वारा बताया गया कि मांझी टोला में देवेंद्र मांझी की बेटी की शादी थी। रास्ते में कीचड़ रहने के कारण ग्रामीणों ने मिट्टी डाल दी, जिससे बाराती गिरें नहीं। इसी से आक्रोशित दबंगों ने उनकी पिटाई कर दी और चाकू से हमला कर दिया। इसके बाद दबंगों ने मुंह में पेशाब कर दी। पत्नी को भी निर्वस्त्र करके पीटा गया। इस मामले में थानाध्यक्ष देवव्रत कुमार ने बताया कि प्राप्त आवेदन के आलोक में प्राथमिकी दर्ज कर जांच-पड़ताल चल रही है। सभी आरोपियों पर लगे आरोपों की जांच की जाएगी। दोष साबित होने पर न्यायोचित कार्रवाई होगी। पुलिस सभी बिंदुओं पर गहराई से जांच कर रही है। आप कल्पना कर सकते हैं कि यह घटना किसी के लिए भी कितनी दिल दहला देने वाली हो सकती है। और क्यों? क्योंकि वे दलित परिवार से हैं। और इसीलिए उनके साथ ऐसा करना इतना आसान था। यह अपमान की परंपरा है। और यह कोई नई बात नहीं है।

           सवाल यह भी है कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? और हमें इसे दूसरे नज़रिए से देखने की ज़रूरत क्यों है? सबसे पहले, यह कानून का मामला है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था हो सकती है?और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? सबसे पहले, यह सरकार की ज़िम्मेदारी है। लेकिन उस समाज की क्या ज़िम्मेदारी है, उस दस्तावेज़ पर ये लोग ऐसा कर रहे हैं, या फिर ऐसा करने की गुप्त पोल कौन खोलता है? क्या आपने कभी सुना है कि किसी अत्याचारी गांव की पंचायत हुई हो और जिस परिवार के सदस्य ने ऐसा किया हो, उसे तुरंत समाज से बाहर कर दिया गया हो? कोई सज़ा नहीं दी गई हो? सच तो ये है कि उनके खिलाफ कभी भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। मिल-बैठकर कोई ऐसा मैकेनिज्म भी विकसित नहीं हुआ जिससे कम से कम हमारे गांव, शहर या इलाके में ऐसी घटनाएं फिर न हों।

           असली विद्रोहियों पर होने वाले अत्याचारों का एक बहुत बड़ा कारण यह है कि सरकार हो या प्रशासन, उनका वहां तक ​​कोई असर नहीं है। और क्योंकि उनकी पहुंच नहीं है, इसलिए उपेक्षित लोगों को पता है कि वे कुछ भी कर लें, वे हमारा कुछ नहीं कर पाएंगे। समस्या यह भी है कि यह एक तरह की सामाजिक विकृति है। दुर्भाग्य से, आप यह जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि यह दलित समाज के बीच की सामाजिक विकृति नहीं है, अपितु यह विकृति के पीछे कथित संस्थागत समाज की सांस्कृतिक विविधता है। तो सवाल ये है कि अगर अत्याचार हुआ है, अगर वो जघन्य है, अगर वो बहुत बुरा है, तो इसकी जिम्मेदारी दलित समाज पर नहीं डाली जा सकती। यह बहुत खतरनाक किस्म की मानसिक बीमारी है। जहाँ देखो, वहाँ कुछ इस प्रकार की घटनाएं निरंतर होती ही रहती है। अफसोस की बात है कि भारतीय समाज किसी भी प्रकार की समानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। दबंगों की वो हर कोशिश होती है जिससे दलित समाज मानसिक गुलामी में फंस कर रह जाएं और अपना आत्मविश्वास खो दे। और क्योंकि दबंग यह जानते हैं कि पुलिस प्रशासन से लेकर शासकीय प्रशासन तक उनके प्रभाव में है इसलिए दबंग गांव वालों पर दबाव बनाने में सफल हैं, ठीक वैसे ही पुलिस और प्रशासन भी उतने ही दबाव में हैं। और इसीलिए, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।

           आपको याद होगा कि मध्य प्रदेश में पेशाब करने का मामले में दोषी व्यक्ति को आखिर में जमानत मिल गई। और सिर्फ़ प्रतीकात्मक तौर पर, उसके घर पर प्रतिकात्मक तौर पार बुलडोजर चलाया गया। इस प्रकार मामला निपटा दिया गया। चौंकने की बात नहीं कि इस प्रकार की अनेक घटनाएं लगातार देखने को मिलती हैं। और दूसरा, पुलिस और प्रशासन को जिम्मेदार बनाइए। मैं आपको बताना चाहता हूं, देखिए एससी-एसटी एक्ट, संशोधन के बाद और पहले भी, पहले ये था कि, अगर सरकारी तंत्र, चाहे वो पुलिस हो, चाहे वो डॉक्टर हो, चाहे वो अस्पताल हो, चाहे वो सरकारी वकील हो, न्याय व्यवस्था में, अगर कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता है, तो इस प्रकार के अत्याचार की घटनाओं पर रोक लगने की संभावना की जा सकती है।

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