
तेजपाल सिंह 'तेज' : 1) प्रेम की प्रथम अनुभूति (First Feelings), 2) अनकहा प्रेम (Unsaid Love”) 3)प्रेम में दूरी और जुदाई (“Distance and Separation”)
-1-
प्रेम की प्रथम अनुभूति
(First Feelings)
प्रेम
शायद अचानक नहीं आता,
वह धीरे-धीरे
मन की देहरी पर
धूप की तरह उतरता है।
पहले
बस एक हल्की-सी आहट होती है,
जैसे
कोई नाम
हवा में घुलकर
आपके चारों ओर चक्कर लगाने लगे।
मैंने पहली बार
तुम्हें देखा नहीं था,
मैंने पहली बार
तुम्हें महसूस किया था—
जैसे
भीतर कोई खिड़की
बिना आवाज़ खुल गई हो।
उस दिन
सड़कें वही थीं,
लोग वही थे,
आकाश भी वैसा ही था—
पर
मेरे भीतर
एक नया मौसम उग आया था।
पेड़
कुछ ज्यादा हरे लगे,
आसमान
कुछ ज्यादा गहरा,
और शाम
जैसे किसी ने
मेरे लिए अलग से रंगी हो।
प्रेम की प्रथम अनुभूति
किसी घोषणा की तरह नहीं आती,
वह तो
धीरे-धीरे
आपकी आदतों में बस जाती है।
आप
अनजाने ही
किसी का इंतज़ार करने लगते हैं,
बिना यह समझे कि
आप इंतज़ार क्यों कर रहे हैं।
घड़ी की सुइयाँ
पहली बार
महसूस होती हैं,
समय
पहली बार
लंबा भी लगता है
और छोटा भी।
आप
भीड़ में भी
अकेले नहीं रहते,
और अकेले में भी
किसी की उपस्थिति
साफ सुनाई देती है।
यह
दिल का शोर नहीं,
दिल की नई भाषा होती है।
उस भाषा में
शब्द कम होते हैं,
धड़कनें ज्यादा।
मैंने पाया—
प्रेम में
सबसे पहले
मन डरता है।
खो देने का डर,
कह देने का डर,
और
यह भी डर
कि कहीं यह सपना
सच न हो जाए।
पर उसी डर के भीतर
एक अजीब-सी रोशनी होती है,
जैसे
अंधेरे कमरे में
किसी ने
बहुत छोटा-सा दीप जला दिया हो।
प्रेम की प्रथम अनुभूति
हमें बदल देती है—
हम
थोड़ा बेहतर होना चाहते हैं,
थोड़ा सच्चा,
थोड़ा कोमल।
हम
अपनी आवाज़ में
अनायास नरमी महसूस करते हैं,
अपनी आँखों में
अचानक गहराई।
दुनिया
पहली बार
सिर्फ दुनिया नहीं रहती—
वह
स्मृतियों, उम्मीदों
और किसी एक चेहरे के
इर्द-गिर्द घूमने लगती है।
मैंने तब समझा—
प्रेम
सिर्फ पाने का नाम नहीं,
यह
अपने भीतर
एक और व्यक्ति के लिए
स्थान बनाने की प्रक्रिया है।
प्रेम की प्रथम अनुभूति
जैसे
अपने ही हृदय में
एक नया कमरा खोज लेना।
जहाँ
एक आवाज़ रहती है,
एक मुस्कान,
एक संभावना।
और तब
आप समझते हैं—
जीवन
सिर्फ जीने की चीज़ नहीं,
महसूस करने की भी चीज़ है।
प्रेम की प्रथम अनुभूति
शायद यही है—
जब
आप पहली बार
अपने भीतर
पूरा आकाश महसूस करते हैं,
और जानते हैं—
अब
आप पहले जैसे
कभी नहीं रहेंगे।
0000
-2-
अनकहा प्रेम
(Unsaid Love”)
कुछ प्रेम
कभी बोले नहीं जाते,
वे
बस आँखों की कोरों में
ठहर जाते हैं—
जैसे
बारिश से पहले
हवा में घुली नमी।
मैंने तुम्हें
कभी कहा नहीं,
पर
तुम्हारा नाम
मेरी चुप्पियों में
हमेशा गूंजता रहा।
तुम्हारे सामने
मैंने सामान्य बातें कीं—
मौसम,
रास्ते,
दुनिया की खबरें,
पर
हर शब्द के पीछे
एक अधूरा वाक्य छिपा था—
“मैं तुम्हें…”
अनकहा प्रेम
शोर नहीं करता,
वह
मन के सबसे शांत कोने में
धीरे-धीरे
घर बनाता है।
वह
किसी वादे की तरह नहीं,
किसी अधिकार की तरह नहीं—
वह
बस उपस्थिति की तरह होता है,
जैसे
आकाश
हर जगह है
पर
कहीं लिखा नहीं।
कितनी बार
मैंने सोचा—
आज कह दूँगा,
आज शब्दों को
आवाज़ दे दूँगा,
पर
हर बार
दिल ने
होठों से पहले
चुप रहना चुन लिया।
क्योंकि
कुछ भाव
शब्दों में आते ही
छोटे लगने लगते हैं।
और
मैं
तुम्हारे लिए
अपने भावों को
छोटा नहीं करना चाहता था।
अनकहा प्रेम
कभी-कभी
सबसे सच्चा होता है—
क्योंकि
उसमें
स्वार्थ कम,
समर्पण ज्यादा होता है।
तुम्हारी खुशी
मेरे प्रेम से
ज्यादा जरूरी लगती थी,
और
शायद
यही प्रेम का
सबसे गहरा रूप है।
मैंने
तुम्हारे साथ
भविष्य नहीं मांगा,
मैंने
बस
तुम्हारी स्मृतियों में
एक शांत जगह चाही।
तुम्हारी हँसी
जब
किसी और वजह से खिलती थी,
मैं
फिर भी
चुपचाप खुश हो जाता था।
यह
हार नहीं थी,
यह
प्रेम का
सबसे निस्वार्थ क्षण था।
अनकहा प्रेम
कभी समाप्त नहीं होता,
वह
बस
रूप बदल लेता है—
कभी
याद बन जाता है,
कभी
प्रार्थना,
कभी
एक हल्की-सी मुस्कान।
समय
बहुत कुछ बदल देता है,
पर
कुछ नाम
दिल की दीवारों पर
हमेशा लिखे रहते हैं।
मैंने
तुम्हें खोया नहीं,
मैंने
तुम्हें
अपने भीतर
संभाल लिया है।
अब
जब भी
शाम थोड़ी उदास होती है,
मैं
तुम्हारी स्मृति से
एक छोटा-सा दीप जला लेता हूँ।
अनकहा प्रेम
शायद यही है—
जब
आप
किसी को
बिना बताए
पूरी जिंदगी
प्रेम करते रहते हैं
