07.03.2025: Write 40 Poems in 40 Days)
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अकेलेपन की भव्यता
आज मन में आया
कि तुम्हें माध्यम न बनाकर
सम्बोधन बना लूं
और तुम से उस साहचर्य की
सीधे-सीधे बात करूं
जो सृष्टि के स्फुरण के प्रथम क्षण से
मेरे साथ तुम्हारा रहा है
उस क्षण जब मुझे लगता था
कि यहाँ न सत् है न असत्,
न मृत्यु है न अमृत
जब मैं अनुभव करता था
कि अपनी ही परतों में
लिपटा हुआ गहन अन्धकार है
जब ऐसा महसूस होता था कि
मेरे चारों ओर नीली चादर में लिपटा हुआ
गहरा और घना फैला हुआ
केवल जल ही जल है।
जब मैं नितान्त एकांकी था
मैं अपने अकेलेपन की भव्यता से पीड़ित था
अपनी ही साँसों की ध्वनि सुन रहा था
और तब मेरी साँसों में तुम उभरी थीं
और मैं मंत्रमुग्ध बन गया था।
मेरे उस अकेलेपन की तुम न केवल साक्षी थीं
तुम उसमें मेरी सगिनी भी थीं
तब से अब तक मैंने तुम्हारे साथ
कितनी ही यात्राएं तय की हैं
कितने ही भीड़ भरे रास्तों में खोकर
हम साथ-साथ गुजरे हैं।
मैंने कितने ही कड़वे, तीखे,
मीठे घूंट पिये हैं
कितने ही आँसू, कितनी ही मुस्कराहटें
मेरे अधरों पर, उठी-बैठी, आई-गई हैं
किंतु हर पल तुमने लय बनकर,
स्वर बनकर, शब्द बनकर
उन मुस्कराहटों को प्राणवान किया है।
मैं कभी चकित हुआ तो कभी व्यथित
कभी आनन्द में भाव विभोर होकर
मैंने तुम्हारे चरणों पर अपना शीश रखा
और कहा कि मेरे जैसा
पतित संसार में कोई दूसरा नहीं है।
हे कविते! एक तुम ही हो जिसने
मुझे हर पल जीने के लिए
हर पल चलने के लिए, हर पल हंसने के लिए
कदम-कदम पर बाअदब विवश किया है।
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तेजपाल सिंंह'तेज'

