कैसे जान जाती हो तुम माँ, कैसे?

 

जब सेहत की खातिर चीनी न लेने की कसम खाई हो मैंने;

फिर दूध का गिलास आधा होने से पहले ही;

कैसे तुम गुड की डली मेरे हाथो में थमा जाती हो;

कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?

 

सर्द दोपहर में जब मेरे होठ सूखते हैं;

अलसाता हूँ, नहीं उठता हूँ मैं;

फिर न जाने कहाँ से तुम ऊँगली में मलहम लगाये

मेरे होंठो पर मल जाती हो;

कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?

 

दफ्तर की उठा-पटक के बाद जब कुछ मूड सही न हो मेरा;

कितनी ही कोशिश करूँ मैं छुपाने की;

पर मेरा मनपसंद खाना खिलाकर, बिस्तर लगाकर;

कैसे तुम मेरे सोने तक बचपन की याद दिलाती हो;

कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?

 

दोस्तों के साथ मैं जब बाहर जाता हूँ;

रात को तुम्हारा फ़ोन जानकर नहीं उठाता हूँ;

तो ठीक मेरे उठते ही, कैसे तुम्हारा फ़ोन बजता है;

और बैग की साइड पॉकेट में कुछ पैसे डाल देने की बात बताती हो;

कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?

जनवरी की सर्द रातो को जब कम्बल छिटक में देता हूं;

बेतरतीब सिलवटों में सिमटा सा मैं गहरी नींद में होता हू ;

तब कैसे तुम चुपके से मेरे कमरे में आती हो;

बाल सहला कर मुझे अपने लाड से ढंक देती हो;

कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?

जब मेरे बार-बार मना करने पर भी;

एक परांठा और मेरी थाली में छोड़ जाती हो;

कैसे ठीक उसी दिन दफ्तर में एक साथी अपना डिब्बा भूल आता है;

हर निवाले में फिर तुम मुस्कुराती दिखती हो माँ;

आंखिर कैसे जान जाती हो तुम माँ, कैसे जान जाती हो?


तेजेश सिंह नेगी