
कैसे जान जाती हो तुम माँ, कैसे?
जब सेहत की खातिर चीनी न लेने की कसम खाई हो मैंने;
फिर दूध का गिलास आधा होने से पहले ही;
कैसे तुम गुड की डली मेरे हाथो में थमा जाती हो;
कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?
सर्द दोपहर में जब मेरे होठ सूखते हैं;
अलसाता हूँ, नहीं उठता हूँ मैं;
फिर न जाने कहाँ से तुम ऊँगली में मलहम लगाये
मेरे होंठो पर मल जाती हो;
कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?
दफ्तर की उठा-पटक के बाद जब कुछ मूड सही न हो मेरा;
कितनी ही कोशिश करूँ मैं छुपाने की;
पर मेरा मनपसंद खाना खिलाकर, बिस्तर लगाकर;
कैसे तुम मेरे सोने तक बचपन की याद दिलाती हो;
कैसे जान जाती हो मां तुम, कैसे जान जाती हो?
दोस्तों के साथ मैं जब बाहर जाता हूँ;
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