बचपन के दोस्त


आज बचपन के दोस्त से मुलाक़ात हुई

मीलों दूर बैठा था वो

अपनी स्क्रीन के आगे

और मैं इधर अपनी के


उसकी बातों में वो ही खनक थी

आंखो में अब भी चमक थी

थोड़ी गहरी हो गई थी माथे की शिकन

पर उंगलियों में वो ही लचक थी।


स्कूल के नल पे छोड़ आया था

जो गीली हसीं मैं

आज उसकी घनी पलकों में

छिप के अंदर से झांक रही थी।


ज़ुबान पे जायका आता था

उसके टिफिन से रोटी चुरा के खाने में जो

वो मिठास आज नाश्ते की प्लेट से

फिर मुझे चिढ़ा रही थी।


बूढ़े बरगद के नीचे

पढ़ा करते थे जिन काले अक्षरों को

उस पुरानी किताब से जैसे 

सूखा गुलाब मिल गया था।


खुशबू थोड़ी कम थी उसमें

पंखुड़ियां थी उधड़ी उधड़ी

पर लम्हे अटके उसमें इतने

आसमान में तारे जितने।


हम चले गए थे वापस

स्कूल की उसी पुरानी इमारत में

जिसके लॉनस पंख खोले हुए

इक परिंदे कि माफिक हमें

फिर से सदा (आवाज़) दें रहें हो।


वो खिड़की जो खुलती थी मैदान में

वहीं दूर एक अकेला नीम खड़ा था

आज भी शायद आते होंगे

हम से नन्हे मोर वहां


उड़ते होंगे गिरते होंगे

चढ़ते होंगे छिपते होंगे

उस नीम के कड़वे पत्तो में

मीठी यादें गड़ते होंगे

हम से नन्हे मोर वहां।


(तेजेश सिंह नेगी)