तक़दीर अब जहान की लिख रहा कोरोना
सस्ती हुई है जान महज़ बिक रहा कोरोना
रुख़ पे नक़ाब, फ़ासले शायरी के सोज़ थे
मायने बदल गये हैं अब इक रहा कोरोना
इक तरफ़ है ख़ौफ़, मर्ज़, ठंडी आह उधर
सियासी गर्म तन्दूर में सिक रहा कोरोना
रैली या किसी भीड़ मे डर से छिपे मगर
तनहा सवारी कार में दिख रहा कोरोना
उजड़े हैं जिनके घर ‘तलब’ उनसे पूछिए
साँसों से बढ़ ज़हन में टिक रहा कोरोना
तेजबीर ‘तलब’


