कहीं किसी परिणिति में

मैं और तुम,

अपनी प्रत्येक भाषा में

साथ ना होने का गीत सुनते हैं,

गीत के बोलों संग

अमर रहता है हमारा मौन।

अपनी बात व्यक्त करने के लहज़े में

भाषा से विभाजित होते हम

अपना ही दरिया हैं,

उसी एक एहसास में बहते

अपना किनारा ढूँढते हैं।

हमारा बहाव किसी भाषा में सीमित नहीं,

ये मौन है

जिसका कोई अनुवाद नहीं,

बहरहाल जो हम

एक दूसरे की भाषा में अपढ़

अपने मौन में कोई संवाद रच लें,

तो हमारे भीतर

हमारा समान्य एहसास,

अपनी अनंत प्रतीक्षा से मुक्त हो

किनारे का स्पर्श पा जाएगा।