लौटी नहीं तुम

मैं निरंतर तुम्हें बुलाता रहा,

तुम्हारे जाने के उपरांत 

सब धीरे-धीरे करते

जीवन से विस्मृत होता चला,

आज वर्षों बाद भी कुछ संग है 

तो हमारी-आपकी स्मृतियाँ 

जो उम्र की गिरह से हो रही हैं उदास। 

ये दिल नहीं भुला पाता, 

तुम्हारी खुरदुरी मुस्कान 

जो छोटे-छोटे अंतरालों से

ख़ुशनुमा कर देती मेरा जग,

ये स्मृतियाँ आज गाथाएं हैं

जो मैं सब को सुनाता हूँ

समझाता हूँ उन्हें,

स्मृतियाँ नहीं उत्पन्न होती

जो टीस की अनुकंपा नहीं उठती

हमारे-आपके बीच,

टीस निर्माता है मधुर स्मृतियों की 

जीवन में अनहद दूरियाँ

स्मृतियाँ तय करती है। 


मुझे आज भी प्रिय है तुम्हारी मुस्कान,

जो तुम्हें मिलती थी

मेरी कविताओं से,

और तुम्हें भाती थी मेरी आँखें

जो चमक उठती थी

तुम्हारी मुस्कान से। 

आज मेरी कविताएं, 

असीम अनुराग से आभारी हैं 

लेकिन ये अनंत नेह भी पाट ना सका,

मेरे अंतर्मन का पोला 

जो तुम्हारी एक खुरदुरी मुस्कान मुझे देती थी।

तुम्हारे उपरांत मेरी रची कविताएं 

सजल होते हुए भी उदास हैं। 

जीवन में किसी के जाने के बाद, 

मन के संग उदास होती है स्मृतियाँ। 

स्मृति को बारम्बार दोहराने से,

बेमुरव्वत वह कितनी ही उदास हो 

तुम मेरी कल्पना में

मुस्कुराते हुए लौट आती हो।

स्मृतियों का ज़िक्र करने से, 

हम उनके उद्धव पर पहुँच जाते हैं 

जहाँ विस्मृत जीवन फ़िर लौट आता है।