किसी से बिछड़ते वक़्त
उनसे जुड़ा प्रेम क्यूँ विदा नहीं लेता?
वह क्यूँ नहीं चला जाता,
उस प्रत्येक क्षण ही।
किसी के बिछड़ने से
मनोदशा की व्यवस्था
नश्वर रूप सी लगती है ,
ये वह मन ही है
जो मिलन की घड़ियों में,
प्रेम के अनश्वर बने रहने की
कामना करता है,
वह बदलाव से अवगत होकर भी
इस बदलाव के यथार्थ होने की
कोई तैयारी नहीं करता।
वह परिपक्व है शायद,
जो दुःख की संभावना में
सुख सहज कर
रखने का प्रयास करता है
शायद वह कुंठित है,
जो दुःख का
अपरिहार्य सत्य देख कर भी
ध्यान नहीं करता।
जीवन में सुख और दुःख,
अपनी प्रत्येक शैली में
हमारा अंतर्मन विकसित करते हैं
अहम है प्रेम के सुख में,
दुःख का विस्तार स्थापित रखना।

