आलमगिर था हमारी रेखाओं का मिलन
जो अकस्मात् मुझे महसूस हुआ,
ये संप्रेषित करती थी
मेरी बेचैनी मुझे,
जो क्षण-क्षण लौटती थी
तुम्हारे अभाव में।
जैसे जीव का संतुलन,
चाहे बुद्धि हो या शरीर
डगमगाता है
भूख से विचलित होकर।
मैं ऐसे ही पीड़ित हो जाता हूँ
तुम्हारे से वंचित होकर,
तुम अगर भूख नहीं
तो भोजन तो हो।
तुम्हारे अभाव से जन्म लेती,
मेरी ये बेचैनी
एक कष्टप्रद आघात है,
जिसका अर्थात् मैं
विवेचन करने में अक्षम हूँ।
ये बेचैनी का दृश्य,
एकरसता में की गई यात्रा के जैसा है
जिसकी कोई निर्दिष्ट अवधि नहीं होती,
परन्तु प्रयोजन होता है
कि ये ऊब
विस्मृत हो जाए सफ़र में।
एकरसता से भरी इन यात्राओं में,
मन नीरव हो या ना हो
मन वापस घर लौटना नहीं भूलता।
मुझे यूँ तो
हर सुख प्यारा है,
परन्तु मुझे मिला दुःख का सहारा है।
तुम्हारे अभाव में ये क्रोधित करती,
भूख मैं कैसे मिटाऊँ?
तुम्हारे अभाव में ये बेचैन करती,
यात्राएं मैं कब तक करूँ?
इश्वर मुझे इन सवालों से उध्दार करो,
ये जवाब से बढ़कर
संतुलन की बात है,
आख़िर ये कैसा मिलन है?
भूख और बेचैनी की नींव में अनंत मगन है,
जवाबों का ज़माना
अब पुराना हो गया,
अब शुरू हुआ
नया सवालों का चलन है।

