काग़ज़ पर उतारने को लफ़्ज़ मैं, 

दुःख का अभ्यास कर रहा हूँ।


हर रात नींद से लड़कर, 

तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहा हूँ।


चाँद को तकता हूँ आज कल, 

उसकी तन्हाई का लिहाज़ कर रहा हूँ।


तुम तो आओगे नहीं मगर, 

तुम्हारे आने का इंतज़ाम कर रहा हूँ।


रोया था जिन रातों को मैं, 

उन अश्कों को नीलाम कर रहा हूँ।


सिलसिला तुम्हारी चाहत का, 

अफ़साने में बयान कर रहा हूँ।


चला जाऊँगा इक दिन छोड़ कर 'हसीन'

ना कहना तुम्हें शर्मसार कर रहा हूँ।