प्रलय आया तो
सिर्फ़ प्रलय नहीं आएगा,
तीव्र गति से अपना तट
छोड़ कर,
उफनती नदी भी
मेरे घर आएगी,
अपना अंश मिट्टी से
परित्याग कर,
एक गौरव स्तंभ भी
मेरे दरवाज़े आएगा,
बागबां की ख़ूबसूरती को
विदा कर,
एक विशाल वृक्ष भी
मेरी खिड़की पर आएगा।
कितना आश्रयजनक होगा
प्रकृति के इस संजोग से,
सबसे अनुशासनबद्ध भी
अपना कर्तव्य निभाने में
विफल हो जाएँगे।
ऐसा अपवाद ना आए,
इस लिए मैं ख़ुद को
अपने घर से निर्वासित कर दूँगा
और चला जाऊँगा
वृक्ष, स्तंभ और नदी से मिलने,
उनके निकट जाकर
अपने कष्ट नहीं सुनाऊँगा,
इस नए दौर में,
उनके कष्ट मिटाने का
प्रयास करना चाहूँगा।
वृक्ष के विस्तार में
निर्जनता की काया को
अपने साए से मिटाऊंगा,
स्तंभ की मौनता में
स्थिरता की मान्यता को
अबोध बन गले से लगाऊंगा,
नदी के रंग में,
आकाश की दृढ़ता को
अपनी आंखों में सजाऊंगा,
ऐसी बातें करके ही
ख़ुद को घर में पाऊँगा।
