हर यात्रा की एक धुन होती है
धुन जो हम चुनते हैं अनंत विकल्पों में,
वही धुन फ़िर
शासन करती है हमारे होठों पर
हम बेफ़िक्र हुए उसे जपते हैं
सबको शोर मचा कर सुनाते हैं
यात्रा समाप्त होने के उपरांत भी
वह नहीं जाती,
धुन की कोई मंज़िल नहीं होती
जैसे संगीतकार को कभी
प्रयाप्त संतुष्टि नहीं होती,
सुख में ख़मोशी नहीं होती।
हम अक्सर उस धुन को
गुमराह करना चाहते हैं,
भिन्न-भिन्न गीतों से उसे बदलना चाहते हैं
इस सब को हासिल करने में
हमें नई धुन स्वीकार है
वजह हमारा शासन से रूबरू होना नहीं हैं,
हम भागना चाहते हैं
उस पुकार से,
पुकार जो वो धुन जागृत करती है हमारे भीतर,
जो नयन मिलन से परे की रुचि है
हमारे हौसले के अधीन है
अभिव्यक्ति है प्रक्रिया की
शुरुआत और मंज़िल का बोया हुआ बीज़।
धुन को खो जाने का दुःख नहीं होता,
उसे ज़रा खेद होता है दिल में
जब इंसान गीत गुनगुनाता है,
परन्तु उसे सुनता नहीं।

