धूप और छाया एक रमणीय संजोग है

ये एकजुट हो

पालते हैं अनेक ख्वाहिशें,

हैरानी की बात है

ये कभी गले नहीं मिलते,

संग साथी हो कर भी

इनका आवास दूरी में है।

धूप अपनी रोशनी से

छाया को जीवित करती है,

छाया कर्ज़दार है धूप की।

धूप और छाया कभी अलग-अलग नहीं मिलते,

धूप से प्रतीत होती शांतिदायक किरणें

जब पेड़ों के आँगन में

प्रवेश करती हैं

तब छाया सृष्टि के विकास सहित,

धूप का ब्याज चुकाती है।


हमारी-आपकी प्रेम की गाथा

मेरे अंतर्मन की आवाज़ को सहलाती है,

हमारा-आपका साथ भी

एक रमणीय संजोग ही है,

धूप और छाया जैसा एक अनमोल संगम,

जो साँसें लेता है दूरी में

जिसका अस्तित्व अवियोज्य है।

हम एकत्रित होकर धूप और छाया हैं,

परन्तु विभक्त हम कोई

सशक्त ऊर्जा भी नहीं

धूप और छाया संग हम अभिशप्त हैं,

अपना प्रत्येक अस्तित्व प्रकाशित करने में।

हम अवतरित तीरते हैं,

सृष्टि को विकसित करने में,

सृष्टि का उध्दार हर युग में

समग्र रूप से

धूप और छाया को समर्पित है,

व्यक्तिगत रूप से

अस्वीकृत करार दिए जाने पर,

ये अपना दुःख साथ लेकर

बारिश की बूँदों से संप्रेषित करते हुए,

खेतों में फूल का स्वरुप लिए उग आते हैं।