वाक्य में आवश्यक है अंतर लगाना,
अगर बात को
संक्षिप्त रूप से रखना हो,
अंतर क्रिया साँस है वाक्य की
जैसे मौन के अंतराल हैं
गीत का विधान।
इतनी दूरी ही चाहिए थी हमें
उठी टीस से लड़ने को,
परन्तु मैं इतना वाक्पटु कभी था ही नहीं
कि दूरी से घनिष्ठ होती,
रिश्तों की गिरह समझ पाता।
दूरी को एक अभिशप्त मिथ्या स्वीकार,
मैंने उसका अस्ल मर्म
पहचाना ही नहीं।
रिश्ता एक ज्वलंत होता गीत है
रिश्ता एक संयुक्त वाक्य की माँग है
जिसमें अपरिहार्य है,
बीच-बीच में थोड़ी जगह रखना।
इच्छुक होना ही प्रयाप्त नहीं
अहम है गूढ़ ज्ञान,
गुप्त रूप से जो सिंचा है
उसे बनाए रखना है
जीवन का मौलिक विधान।
हर आती टीस से अवगत रहना
मुमकिन नहीं,
ना ही मुमकिन है हर बार जीत,
जो समय आने पर
अटल रहा रणभूमि में,
वही है हर युग में वीर।
दूरी की मिथ्या से
ज्वलंत हुई ये आग,
मेरी बस्ती छोड़ कर
अंधकार में डूबा हर घर चमकाती है,
दूरी बेमतलब बदनाम है
यही जीवन में प्रकाश लाती है,
मैं रेखांकित करूं
हमारे बीच सटीक अंतर,
रिश्तों की स्याही ये वाक्य निभाती है।

