अनुवाद करना चाहता हूँ मैं,
तुम्हारी इन रमणीय आँखों को
जो धीमे-धीमे से हस्तांतरित करती है
मुझमे ये अनमोल एहसास,
जिसकी अभिव्यक्ति का दृश्य
बड़ा ही पवित्र है।
ये प्रेम है शायद,
जिसने मेरे मोह पर दस्तक दी
वगरना मैं इतना व्याकुलता से लीन
किसी एहसास के मर्म में
हर सम्त फिरता क्यूँ हूँ?
ये कैसा तिलिस्म है?
सवालों का साहूकार हो गया हूँ मैं
मैं भ्रमित था जीवनकाल,
प्रेम को जवाबों का सम्राट समझता था
प्रेम सवाल की क्रिया समझाता है,
जवाब का प्रसारण हमारे प्रयोजन में है।
अनुवाद करना चाहता हूँ मैं,
तुम्हारी इन मनोरम आंखों को
जो हौले-हौले से जागृत करती है
मुझमे त्याग की गुणवत्ता की वासना,
ये त्याग जो अपरिहार्य है जीवन में
जिसकी मौलिक विद्यार्थि हो तुम।
ये त्याग ही है,
जो उमड़ आता है प्रयोजन की निष्ठा से
प्रयोजन की पूर्णता की प्रक्रिया में शामिल है,
त्याग सा कृतज्ञ भाव।
नदी को भी अपने सौंदर्य के वास्ते,
स्वीकार्य है पत्थरों की क्रूरता
पहाड़ को ऊंचाई के बदले
स्वीकार्य है ज़मीन में ढहना।
जीवन में लंबे अंतरालों के बाद
लौटता ये त्याग,
आज तुम्हारे आने के उपरांत
कुछ माँगता है मुझसे?
प्रेम जागता है तुझसे!
अनुवाद करना चाहता हूँ मैं,
तुम्हारी इन सम्मोहित आंखों को
जो धीरे-धीरे से संप्रेषित करती हैं
मुझमे तुम्हारे होने का ख़्वाब,
ये ख़्वाब जो बड़ा ही निराला है
जिसकी ऐवज में,
मैं त्याग सकता हूँ अपना दिल
तुम्हारे साथ के लिए
मैं त्याग सकता हूँ ओस के मोती
हमारे प्रेम के लिए
मैं त्याग सकता हूँ जवाबों का दीवानापन
इन उपजाऊ सवालों के लिए
ये ख़्वाब बड़ा ही श्रमिक भाव है।
इसे यथार्थ का आकार देने के समक्ष,
मेरा हर अंग माँग की पूर्ति को समर्पित है
मैं सौदाई तुम्हारी आँखों का,
इनमें डूब कर नदी की गहराई नापूँगा
मैं शैदाई तुम्हारी आंखों का,
इनमें उभर कर पहाड़ की ऊंचाई आकुँगा।

