"कविताएँ लिखता रहा
उनका कुछ अंश मिटाता रहा,
कईं अधूरी कविताओं से
जीवन यूँ सजाता रहा।"
एक दिन मैंने,
पूरी कविता लिखी
और आधी मिटा दी,
फ़िर कुछ दिन बाद,
आधी कविता लिखी
और उसमें भी आधी मिटा दी,
यही सिलसिला कायम रखा,
कविताएँ लिखता रहा
उनका कुछ अंश मिटाता रहा,
कईं अधूरी कविताओं से
जीवन यूँ सजाता रहा।
फ़िर हादसा हुआ ऐसा कि
कविताएँ गिने-चुने अक्षरों में
सीमित होकर रह गईं,
दो शब्दों की कविता लिखी
मैं और तुम
लगा जैसे शीर्षक हो,
फ़िर परम्परा के अनुसार
उसमें भी आधा हिस्सा मिटा दिया,
क्या हटाया ना पूछो
जीवन समझो गवां दिया।
फ़िर सोचा ऐसा कि
एक शब्द की कविता लिखूँ,
शीर्षक के सामंजस्य ही
कविता का वर्णन लिखूँ,
लिखा मैंने
हम
और शांत हो गया,
नहीं मिटा सकता अब कुछ
मन हताश हो गया,
क्यूँ विवेक कहे मुझे पर
जीवन साकार हो गया।

