यादें और उम्मीदें
वक्त की सड़क पे
चली जातीं गुनगुनाती
मुस्कुरातीं, और
कभी खिलखिलातीं
कभी लिये नमी और
कभी सपनों को
सजातीं, वक्त के
धागे में नये-नये
मोतियों को पिरोतीं
वक्त की नदी में
चली जाती बहती
इठलाती, बलखाती
मन को बस यूँ हीं
ललचाती, बहलाती ।
-तरसेम कौर


