खामोश है लब उसके मगर कहना बहुत कुछ चाहती है,

कंधे पर बस्ता रखकर वो भी स्कूल जाना चाहती है।


मन उसका भी करता है खेले घर  से बाहर जाकर,

भाई बाहर खेल रहा है  वो चूल्हा पोंछा करती है।


प्लेट में खाना इसके भाई से हमेशा कम रहता  है,

भाई से ज्यादा मेहनत वो दिनभर घर पर करती है।


खेल खेल में जब  भी भाई बहन  में झगड़ा  होता,

मम्मी पापा दोनों  से  वो  हर बार डांट  सुनती  है।


छोटी  सी उम्र  में अब  वो बात  बड़ी  करती  है,

'मैं लड़की हूं ना' बोलकर क्या क्या  नहीं  सहती  है।


फुर्सत के पल में वो क्या क्या सोचती होगी 'सूफी',

अपने सारे पंख कुतर कर वो मम्मी साथ रहती है।