गुनाह-ए-हसीं करने को दिल चाहता है
लबों से लब चखने को दिल चाहता है
आरज़ू-ए-वस्ल की उम्मीद लेकर
ख्वाबों में मिलने को दिल चाहता है
तोड़कर गुनाहों के सारे क़ाएदे क़ानून
लम्स की हिद्दत में जलने को दिल चाहता है
मैं कोई सय्याद नहीं खौफ़ज़दा ना हो मुझसे
संग तेरे पिंजरे में कैद होने को दिल चाहता है
दिल से सुनो तुम मेरी गुस्ताख़ चाहतों को
दिल को दिल से मिलने को दिल चाहता है
लिखकर अपनी चाहतों को कागज़ पर 'सूफी'
लफ़्ज़ों को आराम करने को दिल चाहता है


