आखिरी कविता आखिर कैसे लिख दूं

जब जीवन के आखिर तक लिखना चाहती हूं

मरण शय्या पर जब सिर पहुंचे

तब हाथ में अपने , बस , एक कलम चाहती हूं

उस दिन लिख डालूंगी जो भी मन की बात है

रुदन भरे माहौल में भी जब मेरा मन शांत है

न शोर सुनाई देगा मुझको , न कोई आहट आएगी

पन्नों की पलटन जिस दिन मुझको राहत लाएगी

स्याही की उड़ती गंध , जब नथुनों में भर जाएगी

तब जाकर उस दिन मुझको , चैन की नींद आएगी

सब सोचे हम चल बसे , मगर अब असल बसेरा है

सुर्खियों में भी अब तो , स्वर्ग में अपना डेरा है ।।