मैं! क्या हूं मैं?
कोई नज़्म अनकही सी
या कोई कहानी पुरानी
कोई बात जो कही नहीं
या वो याद सुहानी
किसी किताब के पन्ने सी हूं
खुले तो गुलाब भी और कीट सी हूं
जो देखो तो चांद भी हूं
और ना दिखु तो रात भी हूं
शायद भोली नहीं हूं उतनी पर
खुद की नज़र में नादान सी हूं
तुम्हारे बहुत पास हूं शायद
फिर भी तुमसे अनजान हूं मैं
मैं शायद मैं हूं ही नहीं,
क्योंकि इन सब से परे, एक खुला आसमान हूं मैं !!
