वो मेरे हैं भी नहीं और हम उनके होते जा रहे हैं। आहिस्ता आहिस्ता ही सही हम उनके इश्क़ में खोते जा रहे हैं। दिल्लगी का आलम है यहीं चुपचाप बस उनको देखते ही जा रहे हैं। हर रोज सूरज निकलता हैं ढ़लता है कहीं हम है कि उनके इश्क़ में अपना दिल हारे जा रहे हैं। करते नहीं हम मिलने का इंतज़ार कभी पर वही है जो हर दफ़ा हमारे राहों में आते जा रहे हैं। अब तो हसरत सी हो गई उनके ही होने की जिनके लिए हम रोज़ अपने इश्क़ को बढ़ाते जा रहे हैं। वो मेरे हैं भी नही और हम उनके होते जा रहे हैं।