सर कटाने के लिए मैंने खुद पे इनाम रखा है

मैंने अपनी पलकों पे हिंदुस्तान रखा है |



गली गली चूमता हूँ मैं इसकी

इस मुल्क़ में मेरा पूरा जहान रखा है |



पेशानी जो चूमे गीता-क़ुरान की

उस शख्स का नाम मैंने इंसान रखा है |



मुझे वो नहीँ जानते तो क्या हुआ

मैंने इस मिट्टी की खुश्बू को पेहचान रखा है |



मर मिटते है जो इस मिट्टी पे

आसमाँ पे उनका अलग मुकाम रखा है |


~ताबिश सुल्तान