यह वैमनस्य की लकीरें किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित तुम्हारे पथ को करती अवरोधित तुम स्वंयमेव क्यों उपचार नहीं करते अपनी चिंताओं का वैद्य बनते किसी वृक्ष के टूटने पर पंक्षियों का रुदन न होता परिश्रम मे वे अपनी कसर नहीं रखते