जख्मों से भरा हूँ मुस्कुराहटो से छिला हूँ संवादों को मुखबिर बनाकर मैं खुद को मोल रहा हूँ मैं गूँगा बोल रहा हूँ कोई संताप न कोई है पीर मैं टूटा आइना हूँ काँच का बनती बिगड़ती तकदीर को मैं ख्वाबों से तोल रहा हूँ मैं गूंंगा बोल रहा हूँ आवाजों की बस्ती में मौन खड़े है सारे लोग मैं चिल्लाकर दर्द को अपनी आँखों से बोल रहा हूँ मैं गूँगा बोल रहा हूँ