मैं कौन हूं



कभी इंद्रधनुष तो कभी वैराग्य हूं

कभी अपनी ही आखों से निकला आंसू का कतरा

तो कभी कोई नदिया की धारा

या कभी पूरा समंदर हूं


कभी हिमालय पर जमी बर्फ

तो कभी चिलचिलाते रेगिस्तान की रेत हूं


कभी सूरज की पहली किरण

तो कभी सूर्यास्त का गेरुआ आसमान हूं


कभी ताज में जड़ा हुआ कोहिनूर

तो कभी मधुशाला का टूटा पैमाना हूं


कभी किसी चिड़िया की उड़ान में

तो कभी लहराता हुआ ध्वज हूं


कभी टूटा हुआ कोई तारा

तो कभी तारों की पूरी बारात हूं


कभी किसी की खिलखिलाहटों में

तो कभी शेर की गर्जना हूं


कभी कोई फूल 

तो कभी फूल पर मंडराता भंवरा हूं


सच तो यह है कि जिसने जैसा देखा मुझे बस वैसा ही हूं मैं।




प्रशांत साबू, जामनगर