सुना सबने होगा पर मानेगा कौन,
स्त्री का दायरा पहचानेगा कौन ।
 
 छोटी हो तो रहे पिता के अधीन,
  ब्याह जाए तो रहे पति के अधीन ।

क्यों बेटी को किसी पर निर्भर होना सिखाया तुमने,
इतने सपने सुख-सुविधा का लालच क्यों दिखाया तुमने।

 साज - श्रृंगार के सामान से भरा है बाजार,
  जरूरत - शौक है सबके ना है कोई मकान ।

हो नहीं सकता शोषण इसकी सहमति के बिना ,
शिकायत ही करती रहती ,किसी ताकत के बिना ।

 शिक्षा तो देते हो , ज्ञान भी दो बेटी को ,
 आज़ादी की कीमत बड़ी , यह सिखलाओ बेटी को ।

दो शरीर बनाए कुदरत ने , आत्मा को रखा आज़ाद है
देह से तुम स्त्री हो , आत्मा तुम्हारी भी आज़ाद है।

 करनी है यह कोशिश , बदलाव समाज में लाना है ,
 हर स्त्री को बतलाना है , देह केंद्रित जीवन नहीं बिताना है ।।

                    ज्योति ।।