हे राधा तुम क्यूँ न झगड़ीं 

अपने कृष्ण कन्हाई से

ऐसे कैसे छोड़ गया वो 

तुमको यूँ तन्हाई में 


सारे जग को प्रीत सिखा 

वो प्रेम अधूरा छोड़ गया

सारी राधाओं का नाता 

विरह से क्यूँ जोड़ गया


राम बने सीता को त्यागा

कृष्ण रूप में तुम्हें सताया

आख़िर क्यूँ हर बार प्रभु ने 

प्रेम का ऐसा रूप दिखाया


कृष्ण सरीखे अब भी कितने 

प्रेम दिखा छल जाते हैं

पर हम क्यूँ राधा के जैसे 

धीर नहीं धर पाते हैं


ये कलयुग है, यहाँ आज भी 

कृष्ण तो पूजे जाते हैं

लेकिन बेचारी राधा पर 

लांछन क्यूँ लग जाते हैं


हे राधा इस बार अगर 

तुम कृष्ण संग जग में आना

मत जाने देना मोहन को

तुम अपना हक़ जतलाना


अपनी प्रेम कहानी को 

इस बार पूर्ण तुम कर लेना

सच्चा प्रेम न रहे अधूरा

हर प्रेमी को वर देना।


-(स्वरचित)स्वीटी सिंघल

25/08/2020