ब्रह्म, एक सोच है
साकार हो, परोक्ष है
अचिन्त्य हो भी, चिन्त्य है
अनादि है, अनंत है
न निंदनीय, नींद में
न होशयुक्त, भ्रान्ति में
हर शब्द में है, शांति में
दशों दिशा, दिगंत है
जो जान ले, वो जानता है
जानना, सरल नहीं
है धर्म ये, पीयूषमय
नशों भरा, गरल नहीं
कोई -- न भी हो वहाँ, तो भी
उसकी यात्रा -- अनंत है
मौन में, एकांत में भी
आदमी -- जीवंत है
जी सको तो, जी के देखो
तुम भी, जीना सीख लो
न राग में, न द्वेष में
'अभेदवाद' सीख लो
-स्वव्यस्त

