गलियों में कलियों में सावन की रंगरलियों में कोई अपना सा रहता है कुछ तो अपना सा बसता है
रीतो में प्रीतो में इन मतवाले गीतो में कुछ तो अपना नाता है कोई तो अपना याद आता है
जरा सम्भलकर जरा मचलकर बहती हवायें जरा फिसलकर कुछ तो याद दिलाती हैं खत मन छूने वाला दे जाती हैं
दूर हैं चूर हैं लेकिन न मगरूर हैं कुछ तो तुममें भाता है कोई अंजाना नाता है
इनकार है प्रतिकार है फिर भी तुमसे इकरार है कुछ तो तेरा इंतजार है अब भी तुमसे प्यार है