
गलियों में
कलियों में
सावन की रंगरलियों में
कोई अपना सा रहता है
कुछ तो अपना सा बसता है
रीतो में
प्रीतो में
इन मतवाले गीतो में
कुछ तो अपना नाता है
कोई तो अपना याद आता है
जरा सम्भलकर
जरा मचलकर
बहती हवायें जरा
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