कवि दुःख भरी कथा लिखता है
जता रहा है शोक उन शहीदों के लिए,
थोडा उनके बच्चों और विधवाओं के लिए भी
चाहता तो वो है सिर्फ तालियाँ बटोरना,
और चाहता है थोड़ी इज्जत मिले उसे भी |
कवि चालाक है, दुःख पर लिखता है
और लिखता जाता है गरीब की थाली पर,
वैसे उसने तो पहले भी लिखा था थाली पर गरीब की
पर तालियां नही मिली क्यूंकि थाली तब भरी थी |
इस बार वो चाहता है,
बन जाए माहोल दुखी सा, पैसे न मिले चाहे एक भी
जब वर्णन करे वो उस भूखे शरीर का, जो भीगा पड़ा है बारिश में सर्दी की |
कवि बस चाहता इतना है की बजें तालियाँ हर बार
जब रिसे उनके घाव और बहे आंसू की नदी
कवि मतलबी है बहुत पर दिखाता है,
की होता है दुःख उसे भी