शहर के बीचोंबीच, है मेरा मकान। छत पर उसकी बैठ, सुनाई पड़ता है शहर का गान। साइकिल की ट्रिन्ग ट्रिन्ग, गाड़ियों का हौर्न। ठेले वालो का शोर, उनके समान का बखान। इस सब शोर से जब दुखते है कान ध्यान से सुनने पे सुनाई पड़ती है इक सुरीली तान। एक कोयल की कूक भरती सबमें जान कानो मे गुनगुनाती, मत हो परेशान। चलो सुनाऊँ तुम्हें तुम्हारे गांव का गान।।