यूं तो जागते रातों मे,

इन तारों मे तुझे देखा करते थे,

टिम टिमाते हुये बातों से,

हर बात बताया करते थे।

 

पर क्यूँ इन बारिश के मौसम मे,

तुम हमसे छिप जाया करते हो,

भिंगे हम खड़े रहते हैं,

तुम नजर नहीं आते हो।

 

यूं तो बन परछाई तुम,

हर हरकत मेरी करते हो,

रेतों मे कभी साथ साथ,

कभी दूर भागा करते हो,

दिये जलाए खड़े रहते थे,

कुछ खासनज़रनहीं आते हो।

 

केह दो जो भी कहना हैं,

हर बात सुन्नी बाकी हैं,

उन्न बरखा क मौसम की,

या हो हर काली रातों की,

हूँ प्यार अगर तो केह जाओ,

इकरार मुजशे तुम कर जाओ।

 

ये क्या केह के तुम चले गए,

कुश बात समझनी बाकी हैं,

बरसाती बादल क्यूँ देखू,

जब बात तुम्हें सुनानी हैं,

 

रैनों मे भला क्या रखा हैं,

छोर तुम मुझे यूं जाती हो,

क्या प्यार हमारा अधूरा हैं,

बस दिन मे साथ निभाती हो।

 

की गलती अगर सुधर जाऊंगा,

मंद थी बुद्धि,संभल जाऊंगा,

हर वक़्त एक सा नहीं होता हैं,

प्यार आश्रित नहीं होता हैं।

 

ये तो एक एहसास हैं,

जो साथ हुमेशा रेहता हैं,

तुम दुर कभी हो जाती हो पर,

ये पास हमेशा रेहता हैं।

 

बस एक बात बताना चाहता हूँ,

तेरा साथ निभाना चाहता हूँ।