क्यूँ तमन्नाओं का मेरी तुम नहीं हासिल बने,

मैं बनी काबिल तुम्हारे तुम नहीं काबिल बने।


तुम बहुत उलझे हुए थे ज़िन्दगी के काम में,

मैं लगी पढ़ने क़िताबें सोचा मुस्तकबिल बने।


प्यार पाने की गुज़ारिश में थे बीते दिन मेरे,

मैं बनी बाँदी तुम्हारी तुम मेरे आमिल बने।


क़तरा-क़तरा ले गया सैलाब-ए-ग़म‌ मुझको बहा,

पर न तो तुम पास आए ना मेरा साहिल बने।


ना निशानी देखूँगी तुमसे जुड़ी मैं अब कोई,

याद में जिससे तुम्हारी साँस ना बोझिल बने।


गर्म अश्कों से बने हैं दाग़ ये रुख़सार पर,

और तुम हो सोचते कि हैं बहुत से तिल बने।


अब नहीं पलटुँगी पन्ने उन क़िताबों के कभी,

जिन पे मेरे और तुम्हारे नाम के हों दिल बने।


-स्वरांजलि 'सावन'