काटे नहीं कटेगी शब कुछ और काम कर,

इस इश्क़ के नशे का तू अब इंतज़ाम कर!


सो चुका सुकून से आगोश में मेरी,

अब ज़रा-ज़रा सी तू नींदें हराम कर।


जिस तरह मेरी ग़ज़ल सुनता था अब तलक,

उस तरह से तू भी अब बातें तमाम कर।


मैं तेरे लिए हूँ ख़ास जानती हूँ ये,

पर मेरी ख़्वाहिश है के तू मुझको आम कर।


लग न जाए ख़ुद से ही ख़ुद की नज़र मुझे,

यूँ प्यार अपना ज़ाहिर न सर-ए-आम कर ।


काटनी है शब-ए-हिज्र संग तुझे- मुझे,

रब्ता-ए-गुल में न कुछ एहतराम कर।


अब के लौट कर अगर जाना हो फिर तुझे,

साथ मुझको ले जा फिर चाहे गुलाम कर।


हक़ तेरा ही है मेरी हर एक चीज़ पर,

दिल की मिल्कियत को तू बस मेरे नाम कर!


-स्वरांजलि 'सावन'